श्री बड़े गणपतिजी का मंदिर
श्री महाकालेश्वर मंदिर के पीछे तथा प्रवचन हॉल के सामने श्री गणेशजी की विशालकाल एवं अत्यंत आकर्षक मूर्ति प्रतिस्थापित है। इस मंदिर का निर्माण 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में महर्षि सांदीपनि के वंशज एवं विख्यात ज्योतिषविद् स्व. पं. नारायणजी व्यास द्वारा करवाया गया था। यह स्थान स्व. व्यासजी का उपासना स्थल भी रह चुका है। इस मंदिर में पंचमुखी हनुमानजी की अत्यंत आकर्षक मूर्ति प्रतिष्ठित है। इसके अतिरिक्त भीतरी भाग में, पश्चिम दिशा की ओर नवग्रहों की मूर्तियां हैं।
इस मंदिर में 11वीं शताब्दी में बनी शेषशायी विष्णु की तथा 10वीं शताब्दी में निर्मित गोवर्धनधारी कृष्ण की प्रतिमाएं भी लगी हैं। यहां पर श्रीराम, लक्ष्मण एवं जानकीजी की प्रतिमाएं बनवासी वेशभूषा में उपस्थित हैं।उज्जैन स्थित श्रीराम-जनार्दन मंदिर भी दर्शनीय एवं ऐतिहासिक महत्व से परिपूर्ण है। इसका निर्माण राजा जयसिंह द्वारा किया गया है। यह मंदिर प्राचीन विष्णुसागर के तट पर स्थित है।
उज्जैन के प्राचीन और पवित्र उपासना स्थलों में श्री हरसिद्धिदेवी देवी के मंदिर का विशेष स्थान है। स्कंद पुराण में वर्णन है कि शिवजी के कहने पर मां भगवती ने दुष्ट दानवों का वध किया था अत: तब से ही उनका नाम हरसिद्धि नाम से प्रसिद्ध हुआ। शिवपुराण के अनुसार सती की कोहनी यहीं पर गिरी थी अतएव तांत्रिक ग्रंथों में इसे सिद्ध शक्तिपीठ की संज्ञा दी गई है। यह देवी, सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य कुलदेवी भी कही जाती है।कहते हैं कि सम्राट विक्रमादित्य ने यहां पर घोर तपस्या की थी तथा लगातार 11 बार अपना सिर काटकर इन्हें समर्पित किया था और ग्यारह बार सिर पुन: उनके शरीर से जुड़ गया था। उपरोक्त तथ्यों के कारण इस मंदिर का अपना विशिष्ट महत्व है।
इस मंदिर का निर्माण महाराजा श्री दौलतरावजी सिंधिया की महारानी बायजाबाई द्वारा लगभग 250 वर्ष पहले कराया गया था। नगर के मध्य स्थित इस मंदिर में द्वारकाधीश की अत्यंत मनोहारी मूर्ति है। मंदिर के गर्भगृह में लगा रत्नजड़ित द्वार श्रीमंत सिंधिया ने गजनी से प्राप्त किया था, जो सोमनाथ मंदिर की लूट के साथ ही वहां पहुंच गया था। इस भव्य मंदिर का शिखर सफेद संगमरमर से एवं शेष भाग सुंदर काले पत्थरों से निर्मित है। मंदिर का प्रांगण तथा परिक्रमा पथ भव्य और विशाल है।जन्माष्टमी के अवसर पर यहां पर विशेष आयोजन किया जाता है। वैकुंठ चौदस के दिन महाकाल की सवारी मध्यरात्रि के समय हरि-हर मिलन हेतु यहां पर पधारती है एवं भस्मपूजन के समय श्री गोपालकृष्ण की सवारी महाकालेश्वर पहुंचती है तथा वहां पर उन्हें तुलसी-दल अर्पित किया जाता है। ऐसा अद्वितीय संयोग अन्यत्र कहीं पर भी उपलब्ध नहीं है। इस मंदिर में प्रवचन, भजन एवं कीर्तन के कार्यक्रम सदैव चलते रहते हैं तथा यहां का वातावरण अनवरत भक्तिमय बना रहता है।
भैरवगढ़ के दक्षिण में तथा शिप्रा नदी के तट पर श्री कालभैरव का यह चमत्कारिक मंदिर स्थित है। कालभैरव के दक्षिण में करभेश्वर महादेव एवं विक्रांत भैरव के स्थान हैं। स्कंद पुराण में इसी कालभैरव मंदिर का अवंतिका खंड में वर्णन मिलता है। इनके नाम से ही यह क्षेत्र भैरवगढ़ कहलाता है। राजा भद्रसेन द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया था। उसके भग्न होने पर राजा जयसिंह ने इसका जीर्णोद्धार करवाया। इस मंदिर के प्रांगण में स्थित एक संकरी और गहरी गुफा में पाताल भैरवी का मंदिर है। यह स्थान तांत्रिक साधना हेतु विशेष महत्वपूर्ण है।अष्ट भैरवों में प्रमुख श्री कालभैरव का यह मंदिर अत्यंत प्राचीन और चमत्कारिक है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भैरव प्रतिमा के मुंह में छिद्र न होते हुए भी यह प्रतिमा मदिरापान करती है। जब पुजारी द्वारा मद्य पात्र भगवान भैरवजी के मुंह से लगाया जाता है, तो सबके देखते ही देखते यह पात्र स्वत: ही खाली हो जाता है।
श्री मंगलनाथ का मंदिर एक महत्वपूर्ण और प्राचीन मंदिर है। मत्स्य पुराण में मंगल ग्रह को भूमि-पुत्र कहा गया है। पौराणिक मान्यता भी यही है कि मंगल ग्रह की जन्मभूमि भी यहीं है। इनकी पूजा एवं आराधना का अपना विशेष महत्व है। मंगल ग्रह की शांति, शिव कृपा, ऋणमुक्ति तथा धन प्राप्ति हेतु श्री मंगलनाथजी की प्राय: उपासना की जाती है। यहां पर भात-पूजा तथा रुद्राभिषेक करने का विशेष महत्व है। मंगलवार के दिन यहां पर दर्शनार्थियों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक होती है। ज्योतिष एवं खगोल विज्ञान के दृष्टिकोण से यह स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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